क्या नफरत ही हमारा भविष्य है? हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे पर एक दिल छू लेने वाली बात

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इंसानियत का इम्तिहान - बैतुलनूर (ZorHindi)
धर्म की दीवारें और टूटती इंसानियत: आखिर हम कब तक यूँ ही बँटते रहेंगे?
एक विशेष लेख: बैतुलनूर (ZorHindi)
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Hi दोस्तों, मैं बैतुलनूर, ZorHindi से आपका दोस्त। आज मेरा मन काफी व्यथित है। आज का भारत कहीं न कहीं मज़हब की कटीली तारों में उलझता जा रहा है। एक तरफ हमारा हिन्दू भाई खड़ा है और दूसरी तरफ हमारा मुसलमान भाई। यह देखकर गहरा दुख होता है, पर यकीन मानिए, हर इंसान ऐसा नहीं सोचता।

कुछ लोग आज भी मोहब्बत को ज़िंदा रखे हुए हैं, जैसे मैं और मेरा अज़ीज़ दोस्त अनमोल। हम दोनों का रिश्ता सगे भाइयों जैसा है। हमारे बीच धर्म की कोई दीवार नहीं है। बस फर्क इतना है कि हम दोनों अलग-अलग माँ के बेटे हैं, लेकिन हमारी सोच और हमारा भाईचारा एक है। आज के माहौल में हमारी ये दोस्ती भले ही कुछ लोगों को अजीब लगे, पर असल में यही हमारे भारत की असली खूबसूरती है।

पर सवाल यह है कि हम यहाँ तक पहुँचे कैसे? आखिर किसने हमारे दिलों में ये दूरियाँ पैदा कीं? आज की ही बात है, मैं एक प्रमुख न्यूज़ चैनल पर धर्म से जुड़ी एक डिबेट देख रहा था। बहस इतनी कड़वी थी कि मैंने बस एक सवाल पूछ लिया— "क्या मुसलमान इंसान नहीं होते?" और आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ ही देर में किसी ने जवाब दिया— "नहीं।"

यह सुनकर मुझे अहसास हुआ कि नफरत कितनी गहराई तक बोई जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह है— आज का भ्रामक मीडिया, सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली आधी-अधूरी रील्स और सुनी-सुनाई बातें।

हम अक्सर मोबाइल पर चंद सेकंड की वीडियो क्लिप देखते हैं। उन क्लिप्स में पूरी सच्चाई नहीं होती, लेकिन उनमें नफरत फैलाने वाला मसाला भरपूर होता है। दिखाया जाता है कि किसी एक धर्म के व्यक्ति ने दूसरे को नुकसान पहुँचाया। मैं यह नहीं कहता कि हर खबर गलत होती है, लेकिन अक्सर इन वीडियोज़ को इस तरह से एडिट (Edit) किया जाता है कि देखने वाले का खून खौल उठे। परिणाम यह होता है कि हम अपने उस दोस्त को भी, जिसे हम बरसों से जानते हैं, शक की निगाह से देखने लगते हैं कि "क्या ये भी वैसा ही है?"

मेरे सभी भाइयों से आज कुछ सीधे सवाल हैं:

• क्या हमारा धर्म हमें किसी को नीचा दिखाना सिखाता है?
• क्या कोई भी मज़हब किसी बेगुनाह को तकलीफ पहुँचाने की बात करता है?
• क्या हमारे महापुरुषों या ग्रंथों ने आपस में नफरत करना सिखाया है?
• क्या हम किसी दूसरे के विश्वास का अपमान करके अपने धर्म का सम्मान बढ़ा सकते हैं?

आप इसका जवाब कमेंट बॉक्स में ज़रूर दीजिएगा। पर मेरा मानना है कि इसका जवाब है— "हरगिज़ नहीं।" धर्म का असली अर्थ ही इज़्ज़त और मोहब्बत है। अगर हम अपने धर्मों की गहराई को समझें, तो वहाँ सब बराबर हैं।

मज़हब की नज़र में न कोई जाति ऊँची है, न कोई पद बड़ा। धर्म किसी को उसकी पोस्ट या आर्थिक स्थिति से नहीं देखता, वह सबको एक समान इंसान मानता है। और जो लोग मज़हब का नाम लेकर समाज में ज़हर घोल रहे हैं— चाहे वो हिन्दू हों या मुसलमान—वो वास्तव में धर्म के रास्ते पर नहीं हैं।

"आइए, आज हम कसम खाएं कि हम इंटरनेट की सुनी-सुनाई नफरत का हिस्सा नहीं बनेंगे। हम मज़हब से पहले अपनी इंसानियत को याद रखेंगे। क्योंकि अंत में सिर्फ मोहब्बत ही जीतती है।"

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